पुरस्कार वापसी रोकने की कोशिश

नयी दिल्ली : 26 जुलाई 023 : जनवादी लेखक संघ एक संसदीय कमेटी द्वारा पारित एवं संसद के पटल पर सोमवार को प्रस्तुत उस प्रस्ताव का विरोध करता है जिसमें सरकारी पुरस्कार लेनेवालों से यह लिखित वचन लेने की बात कही गयी है कि वे भविष्य में कभी भी राजनीतिक कारणों से पुरस्कार वापस नहीं करेंगे।

2015 में प्रोफ़ेसर एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद 39 अकादमी पुरस्कार विजेताओं ने पुरस्कार वापसी की थी। तब बुद्धिजीवियों की हत्या पर सरकार के रवैये को एक मौन समर्थन की तरह देखे जाने और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस रूप में चर्चा में लाने में पुरस्कार वापसी की अहम भूमिका थी। उसी लहर से डरी हुई केंद्र सरकार ने अब यह सुनिश्चित करने का फ़ैसला किया है कि भविष्य में ऐसा न हो। यातायात, पर्यटन और संस्कृति से संबंधित संसदीय समिति ने ‘फ़ंक्शनिंग ऑफ़ नेशनल अकादेमीज़ एंड अदर कल्चरल इन्स्टिच्यूशंस’ पर दोनों सदनों में पेश की गयी रिपोर्ट में कहा है कि राजनीतिक कारणों से इस तरह की वापसी ‘देश के लिए अपमानजनक’ है। यहां याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, प्रोफ़ेसर कलबुर्गी की हत्या के बाद लेखकों की पुरस्कार वापसी के पीछे इस बात की नाराज़गी थी कि इस अकादमी पुरस्कार विजेता की हत्या पर भी साहित्य अकादमी ने कोई शोक-सभा करना तो दूर, शोक-प्रस्ताव तक पारित नहीं किया था। इतने बड़े क़द के लेखक के लिए, और वह भी अकादमी से संबद्ध लेखक के लिए अकादमी का यह अपमानजनक रवैया लेखकों को बिल्कुल नागवार गुज़रा था और यही पुरस्कार वापसी का कारण था। इसे ‘राजनीति’ के सीमित अर्थ में एक ‘राजनीतिक कारण’ बता देना हास्यास्पद है, या संभवतः इस बात की स्वीकारोक्ति कि प्रो. कलबुर्गी के हत्यारे सत्ताधारी विचारधारा से संबद्ध थे।

यह एक विडंबना ही है कि कमेटी ने तर्कशील बुद्धिजीवियों की हत्या जैसी घटनाओं को देश के लिए अपमानजनक मानने की जगह उस पर लेखकों की प्रतिक्रिया को देश के लिए अपमानजनक माना है। उनका संदेश स्पष्ट है : ऐसी नृशंस घटनाएं होती रहें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, फ़र्क़ उनकी चर्चा होने से पड़ता है। सरकार का यह रवैया देश में घट रही सभी शर्मनाक और निंदास्पद घटनाओं को लेकर है। मिसाल के लिए, वह मणिपुर में महिलाओं के सार्वजनिक रूप से किए गये अपमान और बलात्कार से विचलित नहीं है बल्कि उस घटना की वीडिओ वाइरल होने से परेशान है और यह जांच करवा रही है आख़़िर वह किस स्रोत से सोशल मीडिया में पहुंची। उसे घटनाओं से आपत्ति नहीं है, घटनाओं को निंदा का विषय बना देनेवाली चर्चा से आपत्ति है।

ठीक यही वजह है कि लेखकों-संस्कृतिकर्मियों को संसदीय समिति के इस प्रस्ताव का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए। यह शर्त एक लेखक और नागरिक के रूप में उसके लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला है। यह बात समिति के एक सदस्य ने कही भी, जैसा कि इंडियन एक्स्प्रेस की ख़बर के मुताबिक़ रिपोर्ट में दर्ज है। उन्होंने बिल्कुल ठीक कहा कि ‘भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हमारे संविधान ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी सौंपी है और साथ में विरोध प्रदर्शन की आज़ादी भी। पुरस्कार वापसी विरोध प्रदर्शन का एक तरीक़ा भर है।’

हालांकि वचनबद्ध होने के बावजूद किसी मौक़े पर लेखक को पुरस्कार वापस करने से रोकना नामुमकिन ही होगा क्योंकि उसे क़ानूनी तौर पर दंडनीय अपराध का दर्जा नहीं दिया जा सकता, पर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘अंडरटेकिंग’ देना उनके लिए अपमानजनक होगा। यह पुरस्कार हासिल करने के लिए अपने लोकतांत्रिक अधिकार का, कम-से-कम काग़ज़ी स्तर पर, समर्पण करने जैसा होगा।

संसदीय समिति की रिपोर्ट में शामिल यह प्रस्ताव उस सोच की दरिद्रता को दिखाता है जो मौजूदा सरकार की ख़ास पहचान बन गयी है। जनवादी लेखक संघ कड़े शब्दों में इसकी निंदा करता है और इसे ख़ारिज किये जाने की मांग करता है। वह लेखकों से उम्मीद करता है कि वे भविष्य में ऐसे किसी सशर्त पुरस्कार को स्वीकार नहीं करेंगे।

 


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