जलेस केंद्रीय बैठक का प्रस्ताव

केंद्रीय कार्यालय :

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22/09/2019 को संपन्न हुई बैठक में जनवादी लेखक संघ की केन्द्रीय परिषद् ने जनतंत्र पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव को संशोधन-परिवर्द्धन के कुछ सुझावों के साथ पारित किया. उन संशोधनों-परिवर्द्धनों के साथ प्रस्ताव का अंतिम रूप इस प्रकार है:

 

जनतंत्र को नेस्तनाबूद करने की कोशिशों के ख़िलाफ़ प्रस्ताव

उदारीकरण के बाद से ही भारत के जनतंत्र पर संकट लगातार बढ़ता गया है और पिछले कुछ वर्षों में वह फ़ासीवादी ख़तरे के निशान को छूने लगा है। जनतांत्रिक कार्यप्रणाली और संस्थाएँ एक ओर हिंदुत्व की साम्प्रदायिक मुहिम के लिए बाधक हैं तो दूसरी ओर थैलीशाहों को अकूत लाभ पहुंचाने वाले नव-उदारवादी अभियान के लिए भी। एक असरदार पुलिस राज्य के ज़रिये ही इन्हें साधा जा सकता है। ज़ाहिर है, इस समय, जब केंद्र की सत्ता इन दोनों हितों के गठजोड़ का प्रतिनिधित्व कर रही है, जनवाद को असाधारण रूप से संकटग्रस्त होना ही था। कश्मीर का मसला हो या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का, गोरक्षा और दूसरे बहानों से मुसलमानों पर लगातार जारी हिंसा का मामला हो या दलितों और दलित अधिकार कार्यकर्ताओं / मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न का—हर जगह यह देखा जा सकता है कि सत्तारूढ़  हिंदुत्व की ताक़तें एक ऐसा समाज बनाने की दिशा में अग्रसर हैं जहां मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक होंगे, दलितों और स्त्रियों को परंपरा-प्रदत्त सनातनी भूमिका तक महदूद रहना होगा, आलोचनात्मक विवेक और प्रतिरोध की आवाज़ें शासन की बंदूक के बल पर ख़ामोश कर दी जायेंगी, और विराट आबादी की आजीविका की क़ीमत पर देशी-विदेशी बड़ी पूँजी को फूलने-फलने के अभूतपूर्व अवसर मिलेंगे।

            5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने संवैधानिक प्रक्रियाओं को धता बताते हुए जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाले आर्टिकल 370 के उन प्रावधानों को हटा दिया जो भारत के साथ उसके विलय के समय संविधान सभा द्वारा स्वीकृत किये गये थे। इन प्रावधानों में किसी भी तरह की तब्दीली के लिए जम्मू और कश्मीर की विधानसभा की मंजूरी अनिवार्य थी, उसे तानाशाही तरीक़े से पहले ही भंग किया जा चुका था। केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यपाल को जन-प्रतिनिधियों वाली विधानसभा का स्थानापन्न मानकर, जनतांत्रिक तौर-तरीक़ों को अपनाये बग़ैर, अपने संख्याबल के आधार पर भाजपा सरकार ने मनमाना फ़ैसला थोप दिया। उसके फ़ैसले से जम्मू और कश्मीर को हासिल विशेष दर्जा ही नहीं छिना है बल्कि उस स्वायत्तता से भी वह वंचित हो चुका है जो अन्य पूर्ण राज्यों को प्राप्त है। इसे लागू किये जाने के नाम पर वहां की सत्तर लाख जनता पिछले डेढ़ महीने से सैन्य घेरेबंदी में है और हर तरह के संपर्क-संचार से कटी हुई, जीने की न्यूनतम सुविधाओं से भी महरूम है। अनगिनत लोगों को नज़रबंदी और क़ैद में रखा गया है। यहां तक कि उन राजनीतिक संगठनों के नेता भी गिरफ़्तार कर लिए गए हैं जो जम्मू और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते आये हैं और विधानसभा तथा लोकसभा के चुनावों में भाग लेकर अपने प्रतिनिधि भेजते रहे हैं। ज़ाहिर है कि उन्हें भी, और कश्मीर की संपूर्ण जनता को भी, दहशतगर्दों के साथ एक ही कोष्ठक में डाल दिया गया है। भाजपा के इन क़दमों ने अलगाववाद को न केवल बढ़ावा दिया है बल्कि आतंकवाद की ज़मीन को और पुख्ता कर दिया है। पर वह इसमें अपना फ़ायदा-ही-फ़ायदा देख रही है। भारत के अकेले मुस्लिम-बहुल राज्य को सभी नागरिक अधिकारों से वंचित कर सैन्य घेरेबंदी में डालना भाजपा-आरएसएस के मुस्लिम-विरोधी लक्ष्यों की हासिल करने की ओर एक बड़ी छलांग है तो अपने सैन्यवादी मंसूबों को पूरा करने की दिशा में उठाया गया एक निर्णायक क़दम भी।

            नागरिकता संशोधन क़ानून लाने और पूरे देश में नागरिकता रजिस्टर बनाने की बात को भी इन्हीं ख़तरनाक इरादों के संदर्भ में देखने की ज़रूरत है। असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को अंतिम रूप दिए जाने के साथ 20 लाख लोगों के नागरिकताविहीन होकर नज़रबंदी शिविरों में ठूंसे जाने की तैयारी किसी दु:स्वप्न के घटित होने के सामान है। यों तो भाजपा-आरएसएस की ओर से भी असम के नागरिकता रजिस्टर को लेकर आपत्तियाँ उठायी गयी हैं, पर उसका कारण है, हिंदू-बहुल ज़िलों से इस रजिस्टर में शामिल न हो पाने वालों का प्रतिशत अधिक होना। निश्चित रूप से, जब वे पूरे देश में नागरिकता रजिस्टर बनाने की बात करते हैं तो उनकी आवाज़ में यह छुपा हुआ आत्मविश्वास बोलता है कि कागज़ात की छान-बीन को लेकर नौकरशाही की नकेल कसने के मामले में आरएसएस के एजेंडे के हिसाब से असम में जो कमी रह गयी थी, वह अब और जगहों पर नहीं रहेगी। साथ ही, यह आत्मविश्वास भी बोलता है कि जल्द ही संसद में अपनी मज़बूत स्थिति के बल पर वे नागरिकता संशोधन क़ानून ले आयेंगे जिसके तहत मुसलमानों के अलावा शेष सभी समुदायों को शरणार्थी मानकर नागरिकता प्रदान की जा सकेगी। सिर्फ़ मुसलमान होंगे जिन्हें 1972 के पहले से भारत में बसे होने के काग़ज़ी सबूत पेश करने होंगे जिसके न होने की सूरत में उन्हें नज़रबंदी शिविर के हवाले कर दिया जाएगा। देश के हर ज़िले में ऐसे नज़रबंदी शिविर बनाने की बात देश के गृहमंत्री कई बार कर चुके हैं। ये कब हिटलर के यातना शिविरों में तब्दील हो जायेंगे, कहा नहीं जा सकता।

            आतंकवाद, आतंरिक सुरक्षा, काग़ज़ी सबूत और ऐसे दसियों बहाने, निगरानी-तंत्र को मज़बूत कर भारत को पुलिस स्टेट बनाने की पूरी तैयारी को दिखाते हैं। वस्तुतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा वैचारिक परिप्रेक्ष्य लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समानता, संघीय संरचना और सामाजिक समानता के विरोध में निर्मित हुआ है। उनकी विचारधारा धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध तो है ही, क्योंकि वह मुकम्मल तौर पर हिटलर-मुसोलिनी की विचारधारा है, उसमें भारत की सड़ी-गली मनुवादी ब्राह्मणवादी सोच भी शामिल है जिसकी वजह से वह स्त्रियों की आज़ादी और बराबरी के भी हक़ में नहीं है। इन्होंने सभी लैंगिक प्रश्नों को अपनी संकीर्ण राजनीति के औज़ार में बदल लिया है। बलात्कार और स्त्री-अधीनता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हिस्सा हैं। कश्मीर और पूरे देश में स्त्रियों के नागरिक अधिकारों पर संगठित हमले किये जा रहे हैं। यौन उत्पीड़न और बलात्कार के अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। आर्टिकल 370 के निरस्त होते ही कश्मीरी लड़कियों को निशाना बनाया गया। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने शर्मनाक बयान दिया कि अब हम भी कश्मीरी लड़कियाँ ला सकते हैं। आसिफ़ा केस के सन्दर्भ में भी याद किया जा सकता है कि अपराधियों को बचाने  की मुहिम चलाते हुए किस तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया गया।

यही स्थिति दलितों के मामले में भी है। सत्ताधारी दल के मनुवादी एजेंडे से प्रोत्साहित तथाकथित ऊँची जातियों की ओर से दलितों पर हमले लगातार बढ़े हैं। भाजपा-आरएसएस की यह भी मंशा है कि दलितों को संविधान ने जो बराबरी का अधिकार दिया है, आरक्षण की सुविधा दी है, वह उनसे छीन ली जाए। यह न भूलें कि जब संविधान बन रहा था, तब संघ ने उसका यह कहते हुए विरोध किया था कि मनुस्मृति के होते हुए संविधान की क्या आवश्यकता! उनके हमले का मूल निशाना भारतीय  संविधान है जिसे वे अगर ख़त्म न कर सके तो पूरी तरह से निष्प्रभावी ज़रूर बना देना चाहते हैं। 2014 से ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार यही काम कर रही है। ऐसे समय में लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वे इस सांप्रदायिक फ़ासीवादी मुहिम के ख़िलाफ़ एकजुट हों और जनवाद की रक्षा के लिए हर तरह के संघर्ष के लिए अपने को तैयार करें।

            जनवादी लेखक संघ जम्मू और कश्मीर राज्य में उठाये गये सभी संविधान विरोधी, लोकतंत्र और संघीयता विरोधी क़दमों को समाप्त करने, सभी गिरफ़्तार नेताओं और नागरिकों को रिहा करने, कश्मीरी जनता की घेराबंदी उठाने और यातायात तथा संचार के सभी साधनों को तत्काल बहाल करने की मांग करता है।

            जनवादी लेखक संघ मानता है कि नागरिकता रजिस्टर तैयार करने की पूरी प्रक्रिया, जिसे आगे आने वाले नागरिकता संशोधन कानून के द्वारा और भी साम्प्रदायिक रुख दिया जाना है, संदिग्ध और ख़तरनाक है। यह राज्यविहीन/नागरिकताविहीन आबादी के रूप में एक विराट मानवीय संकट की शुरुआत है। यह देश को गृहयुद्ध में धकेलने और यहाँ के नागरिकों को रोज़ी-रोटी के सवाल से हटाकर दूसरे सवालों में उलझाने की सोची-समझी रणनीति है। लेखक-संस्कृतिकर्मी होने के नाते हमारी प्राथमिक प्रतिबद्धता मनुष्यता के प्रति है और हम काग़ज़ी सबूतों को आधार बनाकर ‘भीतरी’ और ‘बाहरी’ का फ़र्क खड़ा करने वाली इस प्रक्रिया को पूरे भारत के पैमाने पर लागू करने की किसी भी तरह की कोशिश का विरोध करते हैं।

            जनवादी लेखक संघ धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों पर धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के नाम पर होने वाले हमलों की निंदा करता है और उन्हें रोकने के लिए कठोर क़दम उठाये जाने की मांग करता है।

            जनवादी लेखक संघ स्त्रियों के प्रति होने वाले यौन अपराधों की रोकथाम के लिए कड़े क़दम उठाने और आरोपियों के प्रति, चाहे वे राजनेता हों या धार्मिक नेता, किसी तरह की नरमी बरते जाने का विरोध करता है और उन्हें सख्त से सख्त सज़ा दिये जाने की मांग करता है। साथ ही, भाजपा-आरएसएस ने जिस तरह सभी लैंगिक प्रश्नों को अपनी संकीर्ण राजनीति के औज़ार में बदल लिया है, जनवादी लेखक संघ उसका पुरज़ोर विरोध करता है।


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