हम—कलाकार, लेखक, रंगकर्मी और सांस्कृतिक कार्यकर्ता—उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, सामान्य मजदूरों और उनके साथ एकजुटता में खड़े लोगों, जिनमें कलाकार और बुद्धिजीवी भी शामिल हैं, के खिलाफ चलाये जा रहे दमन, अवैध हिरासतों और दुष्प्रचार अभियान की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं।
नोएडा में आंदोलनरत मज़दूर न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम भुगतान, गरिमा और अपमानजनक कार्य परिस्थितियों से संबंधित पूरी तरह वैध मांगें उठा रहे थे। इन मुद्दों का समाधान करने के बजाय, राज्य सरकार ने गिरफ़्तारियों, धमकी और ‘साज़िश’ की झूठी कहानी का सहारा लिया।
हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ कार्यकर्ताओं, लेखकों और पत्रकारों को बिना कोई कारण बताये उठा लिया। पुलिस ने यह बताने से इनकार कर दिया कि वे हिरासत में हैं या नहीं, और उनके ठिकाने की जानकारी भी नहीं दी।
हाल में केंद्रीय गृह मंत्री ने दावा किया कि भारत में माओवाद समाप्त हो चुका है और अब ‘शहरी नक्सल’ को निशाना बनाना है। अपने ही बलात्कारी नेताओं को बेशर्मी से संरक्षण देने वाली उत्तर प्रदेश की कुख्यात ‘बुलडोज़र सरकार’ ने इसी संकेत को आधार बनाकर मज़दूर आंदोलन के ख़िलाफ़ दमन शुरू कर दिया है। वह मज़दूरों का समर्थन करने की कार्रवाई को ही अपराध घोषित करने की कोशिश कर रही है।
वामपंथी दलों के वरिष्ठ नेता और सांसद, तथा केंद्रीय ट्रेड यूनियन के नेता जब मजदूरों से मिलने जा रहे थे, तो स्थानीय प्रशासन ने उन्हें रोक दिया और विरोधस्वरूप उन्हें धरने पर बैठना पड़ा। वकीलों को अदालत परिसर में प्रवेश से रोका जा रहा है और अपने कानूनी कर्तव्यों का निर्वहन करने पर उन्हें धमकाया जा रहा है। ट्रेड यूनियन नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया है।
गिरफ़्तारी की प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया जा रहा है—न तो गिरफ़्तारी मेमो बनाये जा रहे हैं और न ही परिवारों को सूचना दी जा रही है। एक दुष्प्रचार अभियान चलाकर मज़दूर आंदोलन को ‘नक्सल’ संबंधों वाली ‘साज़िश’ बताया जा रहा है। शांतिपूर्ण विरोध की अपील करने वाले कार्यकर्ताओं को ‘मास्टरमाइंड’ कहा जा रहा है।
यह पैटर्न 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांप्रदायिक हिंसा के बाद हुए दमन की भयावह याद दिलाता है, जहां हिंसा भड़काने वाले आज़ाद हैं और शांति के लिए काम करने वालों को जेल में डाला गया।
राज्य न केवल अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए कानून और प्रक्रियाओं के सभी नियमों का उल्लंघन कर रहा है, बल्कि प्रदर्शनकारियों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ घोषित करने की कोशिश भी कर रहा है।
हम असहमति को अपराध घोषित करने और बोलने वाले लेखकों व पत्रकारों को गिरफ़्तार करने के इस प्रयास को ख़ारिज करते हैं। हम
मांग करते हैं:
• नोएडा प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिये गये सभी कार्यकर्ताओं, मज़दूरों और बुद्धिजीवियों की तत्काल रिहाई।
• सभी हिरासत में लिये गये लोगों के ठिकाने का सार्वजनिक खुलासा और अवैध हिरासतों का अंत।
• कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे दुष्प्रचार अभियान को बंद किया जाये और झूठे ‘साज़िश’ के आरोप वापस लिये जायें।
• गिरफ्तारियों में कानूनी प्रक्रिया का सख्ती से पालन हो, वकीलों तक पहुंच सुनिश्चित की जाए और परिवारों को सूचना दी जाए।
• पुलिस के आचरण की स्वतंत्र जांच हो, जिसमें बंदियों को भोजन और दवा से वंचित करने के आरोप भी शामिल हों।
• मज़दूरों की वैध मांगों पर तत्काल कार्रवाई की जाये।
हम सभी सांस्कृतिक समूहों, लेखकों के संगठनों, रंगकर्मियों, छात्रों और लोकतांत्रिक नागरिकों से अपील करते हैं कि वे मज़दूरों पर और संगठन, अभिव्यक्ति तथा असहमति के अधिकार पर हो रहे इस हमले के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठायें। हम पुस्तकों की दुकानों पर छापों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों और पत्रकारों की गिरफ़्तारी की निंदा करते हैं।
हम सभी लोकतंत्र-प्रेमी नागरिकों से आह्वान करते हैं कि वे ‘साज़िश’ के इस झूठे आख्यान के ख़िलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष करें, जो हमारे संविधान में निहित मूल्यों पर सीधा हमला है।
बांग्ला मंच दिल्ली
जन संस्कृति दिल्ली
जन नाट्य मंच दिल्ली
जनवादी लेखक संघ
जतन नाटक केंद्र, हरियाणा
किशोर महल, त्रिपुरा
पश्चिमबंग आदिवासी ओ लोकशिल्पी संघ
प्रजा नाट्य मंडल
प्रत्यय नाट्य कला केंद्र, महाराष्ट्र
तमिलनाडु प्रोग्रेसिव राइटर्स एंड आर्टिस्ट्स एसोसिएशन
त्रिपुरा संस्कृति समन्वय केंद्र
वेस्ट बंगाल डेमोक्रेटिक राइटर्स एंड आर्टिस्ट्स एसोसिएशन