साथियो,
सितंबर 2025 में बांदा में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन के बाद केंद्रीय परिषद की यह पहली बैठक है। राष्ट्रीय सम्मेलन के बाद आगे के कार्यक्रम तय करने के लिए हमने 30 सितंबर 2025 को पदाधिकारी मंडल की ऑनलाइन बैठक की थी। उसके बाद 14 दिसंबर 2025 को हमने कार्यकारिणी की बैठक नयी दिल्ली के सुरजीत भवन में की थी। तब से हम लगातार सक्रिय हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भी नज़र रखे हुए हैं।
देखा जाये तो पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी ताक़तें पूंजीवाद के रास्ते पर चल रही हैं। धर्म और कॉर्पोरेट के गठजोड़ से उन्होंने सत्ता में बने रहने के सारे उपाय कर डाले हैं। इन स्थितियों में पूंजीवाद मज़बूत हुआ है और एक नवसाम्राज्यवादी दौर शुरू हुआ है। साम्राज्यवाद के चौधरी अमेरिका ने जिस तरह से वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी का रातों-रात अपहरण किया उसे हतप्रभ होकर सारी दुनिया ने देखा। क्यूबा की नाकेबंदी हो या मेक्सिको का मुद्दा हो, अमेरिका का रुख़ उसे साम्राज्यवादी राष्ट्र के रूप में चिन्हित करने के लिए पर्याप्त है। ग़ाज़ा में निर्दोष बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं की हत्या का दोषी इज़रायल अमेरिका के दम पर ही फलता-फूलता रहा है। अभी हाल ही में उसने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर भी आक्रमण किया है। दरअसल जहां भी तेल या अन्य खनिज हैं, वहां पर अमेरिका की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है। यूक्रेन और रूस के युद्ध में भी वह यूक्रेन को इस शर्त पर समर्थन देना चाहता है कि वह अपने खनिजों को अमेरिका के हवाले कर दे। झूठा नैरेटिव गढ़ना और दुनिया भर में उसे फैलाना अमेरिका का शग़ल हो चुका है। अभी ट्रंप ने स्वयं ईरान में हुए आंतरिक नरसंहार की ख़बर को झूठा क़रार दिया है और अफ़सोस जताया है कि नरसंहार के लिए भेजी गयी बंदूकों को कुर्द लोगों ने अपने पास रख लिया। यह किसी भी संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप है। इस बार तो ट्रंप ने न ही सीनेट को विश्वास में लिया और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ को। शायद इसीलिए नाटो देशों ने इस बार अपने को इस युद्ध से दूर ही रखा। ट्रंप नाटो देशों को भी धमकाने में पीछे नहीं रहे। यूं तो साम्राज्यवादी अमेरिका का चेहरा दुनिया दशकों से देखती चली आ रही है। चाहे वहां सत्ता में रिपब्लिकन पार्टी हो या डेमोक्रेट उनकी आंतरिक नीति में भले थोड़ा हेर-फेर हो जाये लेकिन साम्राज्यवादी नीति में अंतर नहीं आता है। लेकिन इस बार ट्रंप ने तो हद ही कर दी है। पूरी सनक के साथ मध्य एशिया को अस्थिर करने में लगे हुए हैं।
ऐसे मौके़ पर भारत की विदेश नीति देखकर चिंता होती है। कभी पाकिस्तान दुनिया भर में अलग-थलग पड़ा हुआ था लेकिन आज वह ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है। भारत अमेरिका के कहने पर रूस से तेल ख़रीदना बंद करता है और फिर अमेरिका के मोहलत देने पर रूस से तेल ख़रीदता है और अपने को हास्यास्पद स्थिति में डाल देता है। भारत में जब भी चुनाव आते हैं तब घुसपैठियों का मुद्दा खड़ा हो जाता है। वास्तव में मुद्दा घुसपैठ का नहीं होता, धर्म के आधार पर विभाजन करके वोट लेने की राजनीति का होता है। चुनाव में जिस तरह की बयानबाज़ी हो रही है, वह बेहद निचले स्तर तक चली जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। कारपोरेट पूंजीवाद और अमेरिका के साम्राज्यवादी चेहरों के बीच एपस्टीन फ़ाइल में आये नामों को देखकर ताज्जुब होता है। जनता के टैक्स पर अय्याशी कर रहे राजनेताओं से आख़िर क्या उम्मीद की जा सकती है?
इन्हीं परिस्थितियों में विगत 3 अप्रैल को नेपाल के प्रगतिशील लेखक संघ के बुलावे पर साथी ज्ञान प्रकाश चौबे के साथ मेरा नेपाल जाना हुआ। हम भारतीय हमेशा नेपाल से अच्छे संबंध की उम्मीद रखते हैं। भारत और नेपाल के बीच जो भाईचारा है वह बना रहे, नेपाली भारतीय नागरिकों का आना-जाना अबाध गति से चलता रहे, जो समरसता दोनों देशों के बीच में है वह बनी रहे, मैं यही कामना करता हूं। जनवादी लेखक संघ ने नेपाल से इस रिश्ते को और मज़बूत करने का प्रयास किया है। मैं उत्तर प्रदेश के सचिव ज्ञान प्रकाश चौबे के साथ नेपाल के महेंद्र नगर में यह घोषणा करके आया हू़ कि इसी वर्ष अक्टूबर या नवंबर में नेपाल में हिंदी में लिखने वाले 10 से अधिक कवि लखनऊ में कविता पाठ के लिए सादर आमंत्रित हैं। यह भी अपेक्षा रखता हूं कि नेपाल के साथियों के बुलावे पर उत्तर प्रदेश के उतने ही कवि नेपाल में कविता पाठ के लिए 2027 के मार्च या अप्रैल के महीने में सहर्ष जायेंगे। इस प्रकार हम ‘कविता की ज़मीन’ कार्यक्रम को राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय फलक पर ले जाने में कामयाब होंगे। ‘कविता की ज़मीन’ कार्यक्रम के आठ संस्करण अब तक हो चुके हैं। आठवां संस्करण 15 मार्च 2026 को लखनऊ में संपन्न हुआ है जिसमें राजस्थान के कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया था। ‘कविता की ज़मीन’ कार्यक्रम का एक पक्ष उत्तर प्रदेश लगातार बना हुआ है। हम चाहते हैं कि अन्य राज्य भी आपस में इस तरह के कार्यक्रम करें तो अच्छा हो।
14 दिसंबर 2025 की बैठक में हमने सभी इकाइयों से स्थापना दिवस मनाये जाने की अपील की थी। यह बताते हुए मुझे खु़शी हो रही है कि जनवादी लेखक संघ का 45 वां स्थापना दिवस 45 शहरों में मनाया गया। 21 फ़रवरी को पड़ने वाले ‘इंक़लाबी किताब दिवस’ को इस वर्ष हमने साम्राज्यवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया। सभी साथियों को 14 फ़रवरी और 21 फ़रवरी का दिन याद रखने की ज़रूरत है। हम प्रत्येक वर्ष अपना स्थापना दिवस और ‘इंक़लाबी किताब दिवस’ मनायेंगे। एक सप्ताह के भीतर पड़ने वाले दोनों कार्यक्रमों में तालमेल बिठाने के लिए यह तय किया गया है कि स्थापना दिवस का आयोजन ऑफ़लाइन होना चाहिए और साम्राज्यवाद विरोधी दिवस का कार्यक्रम यदि ऑफ़लाइन न हो सके तो उसे ऑनलाइन भी किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ का राज्य सम्मेलन विगत 7 फ़रवरी को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य इकाई को हार्दिक बधाई। दिल्ली राज्य इकाई ने भी अपना राज्य सम्मेलन 4 अप्रैल को सफलतापूर्वक संपन्न किया है। दिल्ली इकाई को हार्दिक बधाई। मैं दोनों राज्य सम्मेलनों में उपस्थित रहा हूं। मेरा प्रयास था कि दोनों इकाइयों में उर्दू के लेखकों और लेखिकाओं की भागीदारी ज़रूर हो। दिल्ली राज्य इकाई ने राज्य सम्मेलन के अवसर पर बेहतरीन स्मारिका का प्रकाशन किया है। इसके लिए उन्हें अलग से बधाई। 8 फ़रवरी 2026 को भोपाल में हुई बैठक में तय किया गया था कि 26 अप्रैल 2026 को मध्य प्रदेश का राज्य सम्मेलन होगा। किंतु सदस्यों की सदस्यता के नवीनीकरण की तिथि बीत जाने के बाद वहां सिर्फ़ इंदौर इकाई की सदस्यता का नवीनीकरण हो पाया है। ऐसी स्थिति में यह उचित प्रतीत होता है कि पहले मध्य प्रदेश में सक्रिय रही इकाइयों का नवीनीकरण करा लिया जाये। तत्पश्चात ही वहां पर राज्य सम्मेलन कराया जाये। स्पष्ट है कि 26 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित राज्य सम्मेलन संपन्न करा पाना संभव नहीं है। मध्य प्रदेश में नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद वहां के साथियों से विचार-विमर्श करके राज्य सम्मेलन की नयी तिथि की घोषणा बाद में की जायेगी।
मुझे खु़शी है कि सभी राज्य इकाइयां लगातार सक्रिय हैं। पश्चिम बंगाल से पश्चिम बर्धमान जिले की इकाई का जुड़ना इस बीच की नयी उपलब्धि है। विधानसभा चुनाव के कारण वहां के साथी इस बैठक में नहीं आ पाये हैं। उन्हें विशेष रूप से हमने आमंत्रित किया था। चुनाव के बाद वहां के सदस्यों की वास्तविक संख्या भी पता लगेगी। यह देखना सुखद है कि कविता के अलावा अन्य विधाओं पर भी राज्यों में कार्यक्रम हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मुक्त छंद के कवियों की भागीदारी ‘कविता की ज़मीन’, ‘जनपद की कविता’ और “नवांकुर” जैसे कार्यक्रमों में होती रही है। इस वर्ष से गीतकारों और शायरों के लिए भी कार्यक्रम शुरू हुए हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गीतकारों और शायरों के सम्मेलन की पहली कड़ी कानपुर में विगत 5 अप्रैल को संपन्न हुई है जिसमें मैं भी उपस्थित था। लोक भाषा को महत्व देते हुए रांची की इकाई महत्वपूर्ण काम कर रही है। बिहार और झारखंड में लोक भाषा उप समिति भी गठित हैं। इस बीच जलेस से जुड़े अनेक लेखकों की किताबें प्रकाशित हुई हैं। मैं सभी लेखकों को शुभकामनाएं देता हूं।
मौजूदा परिस्थितियों में विभिन्न मंचों से बार-बार यह चिंता जतायी जाती है कि तीनों लेखक संगठनों को समय-समय पर मिलकर काम करना चाहिए। इसका उदाहरण भी बीच-बीच में दिल्ली, इलाहाबाद, लखनऊ और अन्य जगहों से मिलता रहता है। इस दिशा में मेरी जन संस्कृति मंच के महासचिव से बात हुई है। हम दोनों इस बात पर सहमत हैं कि वर्ष में कुछ कार्यक्रम सभी इकाइयां मिलकर करें तो अच्छा रहेगा। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव को भी मुझे जोड़ते हुए पत्र लिखा है। यदि सब कुछ ठीक रहा तो संभव है कि इसी वर्ष हम साथ मिलकर कुछ कार्यक्रम कर सकेंगे। मुझे लगता है कि अगर इसकी शुरुआत 31 जुलाई से हो तो सबसे अच्छा रहेगा। इस संबंध में जो भी प्रगति होगी उससे आप सबको अवगत कराया जायेगा। हमारा मानना है कि प्रेमचंद जयंती अगर हर जगह पर तीनों लेखक संगठन मिलकर मनायें तो अच्छा संदेश जायेगा। लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूं कि जलेस की भागीदारी किसी भी स्तर पर कमज़ोर नहीं दिखनी चाहिए।
14 दिसंबर की कार्यकारिणी बैठक में लेखिका सम्मेलन/कार्यशाला लखनऊ में अक्टूबर या नवंबर में कराये जाने की बात तय हुई थी। इस पर साथी ज्ञान प्रकाश चौबे अपनी रिपोर्ट के समय बात रखेंगे। कहानी विधा पर एक कार्यशाला कराये जाने की ज़िम्मेदारी साथी संदीप मील को दी गयी थी। प्रयास था कि जून के पहले यह कार्यशाला अलवर में हो जाये, किंतु अभी तक उसकी कोई तिथि निश्चित नहीं हो पायी है। साथी संदीप मील अपनी रिपोर्ट में अवगत करायेंगे कि अलवर में वह कार्यशाला कब होगी। आप जानते हैं कि ‘नया पथ’ का वेब वर्ज़न लगातार प्रकाशित हो रहा है। हम चाहते हैं कि यदि उसका सप्ताह में कोई दिन तय कर दिया जाये और उसी दिन उसका प्रकाशन हो तो अच्छा रहेगा। साथी संजीव कुमार अभी भी उस दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं जिसके लिए उन्हें मैं धन्यवाद ज्ञापित करता हूं। ‘नया पथ’ के प्रिंट वर्ज़न के प्रकाशन की योजना भी है। केंद्रीय अध्यक्ष और दोनों कार्यकारी अध्यक्ष सलाहकार मंडल में होंगे। महासचिव और संयुक्त महासचिवों के अलावा रेखा अवस्थी जी और साथी संजीव कौशल संपादक मंडल में शामिल हैं। साथी ज्ञान प्रकाश चौबे प्रबंध संपादक होंगे। हम लगातार प्रयास कर रहे हैं कि उसे शीघ्र प्रकाशित कर सकें। उम्मीद है कि हमारा प्रयास सफल होगा।
सभी इकाइयों को 1 जनवरी से 31 मार्च तक का समय सदस्यता के नवीनीकरण के लिए दिया गया था। आज उपस्थित राज्य सचिव अपने राज्यों की सदस्य संख्या से अवगत करायेंगे। मध्य प्रदेश से इंदौर की रिपोर्ट आ चुकी है। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के राज्य सचिवों ने भी अपनी रिपोर्ट भेज दी है। पश्चिम बंगाल की रिपोर्ट चुनाव के बाद आयेगी। मध्य प्रदेश में अन्य इकाइयों के नवीनीकरण की प्रक्रिया अभी चलती रहेगी। हरियाणा ने भी 30 अप्रैल तक का समय मांगा है।
केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद जारी किये गये कार्य वृत्त में शेष बचे अन्य मुद्दों पर संबंधित साथी अपनी बात रखेंगे। उसके लिए कार्य सूची अलग से प्रेषित की जा चुकी है। केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद साहित्य जगत की अनेक विभूतियों का निधन हुआ है। मैं उन्हें जनवादी लेखक संघ की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। जनवादी लेखक संघ की ओर से दिवंगत साहित्यकारों के प्रति शोक संवेदना जारी होती रही है। अन्य मुद्दों पर भी बयान जारी किये जाते रहे हैं। अभी तक बयान जारी करने का कार्य मैं स्वयं देख रहा था लेकिन आगे से बयान जारी करने का दायित्व संयुक्त महासचिव साथी बजरंग बिहारी तिवारी को दिया जा रहा है। हमारा प्रयास है कि आने वाले दिनों में हम गुणवत्तापूर्ण कार्यक्रम कर सकें। इस दक्षिणपंथी माहौल में जबकि सारी चीज़ें सर्विलांस पर हैं, तब हम किस तरह से प्रतिरोध दर्ज करा सकते हैं इसके बारे में भी सोचना होगा। हमें अंबेडकरवादी साथियों को भी जोड़ना है, सोशल मीडिया पर जलेस की सक्रिय उपस्थिति दर्ज करानी है, धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर अपनी स्पष्टता बनाये रखनी है और सेवा में रहते हुए सरकारी दबाव में काम करने वाले साथियों के संपर्क में भी रहना है। प्रयास हो कि हिंदी वाले उर्दू वालों को पढ़ें और उर्दू वाले हिंदी वालों को पढ़ें। स्टडी सर्किल भी चलें तो अच्छा रहेगा। साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के बीच आपसी तालमेल हो तो बेहतर कार्यक्रम किये जा सकेंगे। केरल में संपन्न पहली भारतीय सांस्कृतिक कांग्रेस में भी इसी तरह की अपेक्षा की गयी है। अनेक इकाइयों की अभी तक की रिपोर्ट बहुत उत्साहजनक है। मध्य प्रदेश में भी विभिन्न इकाइयां जलेस के बैनर से ही कार्यक्रम कर रही हैं और शीघ्र ही हम अन्य राज्यों में भी सदस्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। आप सभी को आगे के कार्यक्रमों के लिए शुभकामनाएं।