लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में (बशीर बद्र की मशहूर ग़ज़ल का शेर)
नयी दिल्ली : 29 मई 2026 : आम जन की जु़बान पर मौजूद शायर बशीर बद्र (जन्म 15.02.1935) का 28 मई 2026 को इंतकाल हो गया। वे 91 वर्ष के थे। लंबे समय से वे उम्र से जुड़ी कई दिक्क़तों से जूझ रहे थे। स्मृतिलोप (डिमेंशिया) नामक बीमारी ने उनकी, याद रखने और खु़द को पहचानने की ताक़त ख़त्म कर दी थी। पिछले कुछ वर्षों में कई बार उनके न रहने की बात फैली लेकिन हर बार अफ़वाह साबित हुई। ईद-उल-अजहा के दिन उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।
बशीर बद्र (असल नाम सैय्यद मुहम्मद बशीर) कानपुर में पैदा हुए थे हालांकि उनका परिवार फ़ैज़ाबाद ज़िले का बाशिंदा था। दर्जा तीन तक कानपुर के एक स्कूल में पढ़ाई करने के बाद पुलिस में मुलाज़िम अब्बाजान सैय्यद मुहम्मद नज़ीर के तबादले के कारण परिवार इटावा आ गया। यहां से उन्होंने हाईस्कूल पास किया। वालिद का इंतकाल हो जाने के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़कर पुलिस महकमे में नौकरी कर ली। जब परिस्थितियां अनुकूल हुईं तो उन्होंने नौकरी छोड़कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम. ए. और पीएच. डी. किया। कुछ दिन यहां अस्थाई तौर पर पढ़ाया। बाद में वे मेरठ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में नियुक्त हो गये और यहीं रहते उनकी शायरी लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ती गयी। 1987 में मेरठ में भयंकर सांप्रदायिक दंगा हुआ। इस दंगे में उनका घर भी लूट लिया गया और आग के हवाले कर दिया गया। तब वे भोपाल में आ बसे और अंत तक यहीं रहे।
कई पुरस्कारों से नवाज़े गये शायर बशीर बद्र की ग़ज़लों के छः संग्रह छपे। उन्होंने आम फ़हम भाषा में अपनी शायरी लिखी। ब्रज, अवधी आदि बोलियों के अलफ़ाज़ उनकी शायरी में सहजता से चले आते हैं। वे मिलीजुली संस्कृति के शायर थे। पॉपुलर नज़्मों, ग़ज़लों के अलावा बशीर साहब ने संजीदा शायरी भी की है। वे आम-इंसान तक पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश करने वाले शायर थे। जनवादी लेखक संघ ऐसे महबूब शायर के इंतक़ाल पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए अपनी ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करता है।