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प्रेस विज्ञप्ति

New Delhi

दिनांक 20-8-2010

‘नया ज्ञानोदय’ के अगस्त 2010 के अंक में प्रकाशित विभूतिनारायण राय के साक्षात्कार में कुछ महिला लेखकों के बारे में कहे अशोभनीय शब्दों को लेकर उठे विवाद के प्रसंग में अपने हस्तक्षेप को आगे बढ़ाते हुए जनवादी लेखक संघ ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की विजि़टर, माननीय राष्ट्रपति महोदया के नाम एवं ज्ञानपीठ के प्रबंध न्यासी व न्यास के अन्य सदस्यों के नाम पत्र लिखे हैं। माननीय राष्ट्रपति महोदया से ज.ले.स. ने यह अनुरोध किया है कि कुलपति की इस ग़ैरजिम्मेदार एवं अशिष्ट बयानबाज़ी का संज्ञान लेते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई करें और इस प्रकार स्त्री जाति के इस अपमान का प्रतिकार करें।

भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासियों के नाम लिखे गए पत्र में ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक की सम्पादकीय नीति और रुझान को सवालिया घेरे में खड़ा किया गया है, संस्थान में उत्तरदायित्वपूर्ण पद पर उनके बने रहने को संस्थान की गरिमा एवं प्रतिष्ठा के प्रतिकूल बताया गया है और यह अनुरोध किया गया है कि न्यास की 23 अगस्त को होने वाली बैठक में वे हिंदी लेखक और पाठक समुदाय की जनतांत्रिक मांग का सम्मान करेंं।
पत्रों की प्रतिलिपि संलग्न है।

--M.M.P. Singh, Gen. Secretary ; Chanchal Chauhan, Gen.Secretary


प्रेस विज्ञप्ति

New Delhi

दिनांक 20-8-2010

प्रति
श्रीमती प्रतिभा पाटिल माननीया राष्ट्रपति
विजि़टर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
राष्ट्रपति भवन
नयी दिल्ली।
माननीया राष्ट्रपति महोदया,
जनवादी लेखक संघ आपका ध्यान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय के उस साक्षात्कार की ओर आकर्षित करना चाहता है जो ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका के अगस्त, 2010 अंक में प्रकाशित हुआ है। इस साक्षात्कार में कुलपति श्री राय ने एक प्रश्न के उत्तर में (हिंदी की) लेखिकाओं के लिए अश्लील एवं अत्यंत अपमानजनक शब्द ‘छिनाल’ का प्रयोग किया है। यही नहीं, उन्होंने अपने इस साक्षात्कार में एक लेखिका विशेष (नाम नहीं दिया गया है) की हाल ही में प्रकाशित आत्मकथात्मक पुस्तक के लिए ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’ शीर्षक सुझा कर उपर्युक्त शब्द के आशय की पुन: पुष्टि की है। स्त्रियों के बारे में श्री राय की ये अशिष्ट, अश्लील और अपमानजनक टिप्पणियां, निस्संदेह, अनजाने में नहीं, बल्कि सोच-समझ कर की गयी टिप्पणियां हैं और ये उनके वास्तविक विचारों तथा इरादों की अभिव्यक्ति हैं।

जैसा कि स्वाभाविक था, हिंदी के पाठकों और लेखकों के बीच इस साक्षात्कार को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया हुई। कई लेखकों, लेखिकाओं तथा जनवादी लेखक संघ समेत अनेक लेखक-संगठनों ने इस साक्षात्कार की भत्र्सना करते हुए श्री विभूति नारायण राय से तत्काल क्षमा-याचना की मांग की और सरकार से यह दरख्वास्त की कि कुलपति महोदय के खि़लाफ़ अविलंब अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाये।

अफ़सोसनाक यह है कि कुलपति श्री राय इस व्यापक आक्रोश को पूरी हिकारत के साथ दरकिनार करते हुए विभिन्न अख़बारों में और टी.वी. चैनलों पर अपने शब्दों की व्याख्या करते हुए उसी विचार को सही ठहराते रहे और ऐसा करते हुए उन्होंने स्त्री जाति को और अधिक अपमानित किया। यहां तक कि उन्होंने प्रेमचंद जैसे महान लेखक को भी बेबुनियाद अपने बचाव में घसीटते हुए कहा कि इस शब्द का प्रयोग मुंशी प्रेमचंद ने भी सौ बार किया है, जबकि प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञों के अनुसार इसमें कोई सच्चाई नहीं।

इस संदर्भ में हम दो और तथ्यों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं। भारतीय दंड संहिता (1987) के अंतर्गत ‘स्त्री का अश्लील चित्रण’ (indecent representation of woman) एक दंडनीय अपराध है। इस संहिता के सेक्शन 509 के अनुसार, यदि सार्वजनिक जीवन में शब्दों के द्वारा भी स्त्री की गरिमा को नुक़सान पहुंचाया जाता है, तो भी वह दंडनीय अपराध है। यहां उच्चतम न्यायालय के विशाखा फ़ैसले का उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा, जहां माननीय उच्चतम न्यायालय ने भारतीय संविधान की धारा 14, 15(1), 19(1)(g) और 21 में स्त्री के समान अधिकारों और उसकी गरिमा की रक्षा के लिए किये गये प्रावधानों के तहत ही सार्वजनिक एवं निजी, दोनों तरह के कार्यस्थलों पर स्त्रियों को यौन-उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने तथा अपराधियों को दंडित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिये हैं। इन दिशा-निर्देशों को राष्ट्रीय महिला आयोग ने सन् 2006 में आवश्यक कार्रवाई हेतु सभी विश्वविद्यालयों को जारी किया था। इसके अनुसार किसी भी सार्वजनिक और निजी संस्थान के अधिकारी का यह दायित्व है कि वह अपने संस्थान में स्त्रियों की यौन-उत्पीड़न से सुरक्षा सुनिश्चित करे और यदि कोई ऐसा अपराध करता है तो ऐसे व्यक्ति के खि़लाफ़ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई करे। यदि अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो उस फ़ैसले में उसे दंडित करने की बात साफ़ तौर पर कही गयी है। यौन-उत्पीड़न के अंतर्गत शारीरिक चेष्टाओं के साथ-साथ मौखिक, लिखित एवं सांकेतिक अपमानजनक अभिव्यक्तियों को भी समान अपराध माना गया है।

संविधान की उपर्युक्त धाराओं एवं प्रावधानों के मद्देनज़र यह स्पष्ट है कि श्री विभूति नारायण राय, जो कि वर्तमान में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं, उक्त साक्षात्कार में दिये गये अपने बयानों के चलते इस उच्च पद पर बने रहने की पात्रता खो चुके हैं। जिस व्यक्ति पर अपने संस्थान में शिक्षिकाओं, छात्राओं और महिला कर्मचारियों को यौन-उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने का दायित्व है, वही स्त्री जाति के प्रति अशिष्ट एवं अश्लील शब्दों का प्रयोग कर रहा है। ऐसे में इतनी गंभीर जि़म्मेदारी उस पर कैसे छोड़ी जा सकती है!

जनवादी लेखक संघ यह मानता है कि ऐसी अशोभनीय टिप्पणियां वस्तुत: स्त्री-सशक्तिकरण की निरंतर जारी प्रक्रिया पर चोट करने वाली पुरुषवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं जिसमें स्पष्ट रूप से संविधान के प्रावधानों और उनमें निहित भावनाओं की अवहेलना झलक रही है। पिछले पंद्रह-बीस वर्षों मे स्त्रियों एवं दलितों के लेखन का अभूतपूर्व उभार हिंदी में दिखायी पड़ा है। यह सामाजिक स्तर पर उनके सशक्तिकरण का एक ज्वलंत प्रमाण है। इसे बल पहुंचाने के बजाय कुलपति श्री विभूति नारायण राय अपनी रूढ़ पितृसत्तात्मक मानसिकता की बौखटाहट में असंवैधानिक टिप्पणियां कर रहे हैं।

चूंकि आप महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की विजि़टर हैं, इसलिए इस ज्ञापन के माध्यम से जनवादी लेखक संघ आपसे यह मांग करता है कि आप कुलपति श्री विभूति नारायण राय पर अविलंब अनुशासनात्मक कार्रवाई करें। आप भारत की पहली महिला राष्ट्रपति हैं। यह हम सबके लिए गौरव की बात है कि देश के सर्वोच्च पद को एक महिला सुशोभित कर रही हैं। इसलिए आपसे यह अपेक्षा करना स्वाभाविक है कि आप इस संबंध में ठोस कार्रवाई करके स्त्री जाति के इस अपमान का प्रतिकार करेंगी।

धन्यवाद सहित,

--M.M.P. Singh, Gen. Secretary ; Chanchal Chauhan, Gen.Secretary


प्रेस विज्ञप्ति

New Delhi

दिनांक 20-8-2010

प्रति
प्रबंध न्यासी
भारतीय ज्ञानपीठ
18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड
नयी दिल्ली-110003

महोदय,

जनवादी लेखक संघ पहले भी प्रेस-विज्ञप्ति के माध्यम से ‘नया ज्ञानोदय’ के ‘बेवफ़ाई सुपर विशेषांक-2’ के संबंध में अपनी राय को सार्वजनिक कर चुका है और यह मांग कर चुका है कि भारतीय ज्ञानपीठ ‘नया ज्ञानोदय’ के ऐसे ग़ैरजि़म्मेदार संपादक के खिलाफ़ कार्रवाई करे (प्रति संलग्न)। श्री कालिया के ग़ैरजि़म्मेदाराना रवैये, अश्लील शब्द-प्रयोगों द्वारा स्त्री जाति का अपमान करनेवाले साक्षात्कार को संपादकीय में महिमामंडित करने के प्रयासों तथा ‘बेवफ़ाई’ जैसी धारणा पर एकाग्र अंक की परिकल्पना करने वाली उनकी संपादकीय नीति को देखते हुए अनेक रचनाकारों ने बार-बार आपके सामने यह मांग रखी है। इनके उत्तर में आपके न्यास ने यह दावा किया है कि फ़ौरी कार्रवाई के तहत उक्त विवादित अंक को बाज़ार से वापस मंगा लिया गया है और आवश्यक संशोधन-सुधार के बाद दुबारा बाज़ार में लाया गया है।

इस संबंध में हम कुछ बातों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं।

  1. न्यास के इस दावे के बावजूद पत्रिकाओं के स्टॉल्स पर न सिर्फ ‘नया ज्ञानोदय’ की असंशोधित प्रतियां मौजूद हैं, बल्कि - विक्रेताओं की मानें तो - लगातार पहुंच रही हैं।
  2. मामला महज़ भूल-सुधार का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। जिस व्यक्ति की संपादकीय नीति ऐसी अशिष्ट एवं अश्लील टिप्पणियों को उछालने तथा ‘बेबाक’ कह कर महिमामंडित करने की रही है, उसके संबंध में कोई स्पष्ट निर्णय लिये बग़ैर न्यास अपने नेक इरादों का परिचय नहीं दे सकता। स्मरणीय है कि श्री कालिया पहले भी ‘नया ज्ञानोदय’ के माध्यम से एकाधिक लेखिकाओं के साथ ऐसा अपमानजनक बरताव कर चुके हैं जिसे किसी भी कसौटी पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
  3. श्री कालिया के अधीन ‘नया ज्ञानोदय’ में कार्यरत एकाधिक युवा लेखकों ने जिस तरह उनके पक्ष में हस्ताक्षर अभियान चलाया है, वह स्पष्ट रूप से श्री कालिया द्वारा अपनी कार्यालयी हैसियत के दुरुपयोग का एक उदाहरण है। साथ ही, वह इस बात का सबूत है कि वे अपने कृत्य पर शर्मिंदा होने के बजाय उसका औचित्य सिद्ध करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में कोई हैरत नहीं कि वे अपनी उक्त संपादकीय नीति पर क़ायम रहें और ऐसे कामों को अंजाम देते रहें जो भारतीय ज्ञानपीठ की गरिमा के अनुरूप नहीं हों।

महोदय, इन बिंदुओं के मद्देनज़र हमें इस बात में संदेह है कि आपके संस्थान के उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर श्री रवींद्र कालिया के बने रहने से संस्थान की प्रतिष्ठा एवं गरिमा सुरक्षित रह पायेगी। हम आपसे यह अपेक्षा रखते हैं कि न्यास की आगामी बैठक, जो 23 अगस्त 2010 के लिए तय है, में आप न्यायोचित निर्णय लेकर हिंदी के लेखक एवं पाठक समुदाय की जनतांत्रिक मांग का सम्मान करेंगे।

हम उम्मीद करते हैं कि न्यास की बैठक में आप इस पत्र को विचारार्थ प्रस्तुत करते हुए इसकी प्रतियां सभी न्यासियों को मुहैया करायेंगे।

--M.M.P. Singh, Gen. Secretary ; Chanchal Chauhan, Gen.Secretary

प्रेस विज्ञप्ति

New Delhi

दिनांक 2–8–2010

जनवादी लेखक संघ श्री विभूतिनारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका (अगस्त 2010 अंक) में दिये उस साक्षात्कार की घोर निंदा करता है जिसमें उन्होंने हिंदी लेखिकाओं के प्रति अपमानजनक और लांछनापूर्ण शब्दों के प्रयोग से अपनी विकृत और कुत्सित मानसिकता का इजहार किया है। इसके साथ ही हम नया ज्ञानोदय के संपादक की भी, इस तरह के महिला विरोधी अभियान चलाने के गैरजिम्मेदाराना कदम के लिए, भत्र्सना करते हैं। छद्म नैतिकता के इन पहरेदारों ने प्रत्यक्षरूप से लेखक और लेखिकाओं के आत्मसम्मान और उनके लेखकीय अधिकार पर कुठाराघात द्वारा अपनी तानाशाही सोच का परिचय दिया है।

जनवादी लेखक संघ की यह मांग है कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक कुलपति के इस आचरण का नोटिस ले और अविलंब अनुशासनात्मक कार्रवाई करे क्योंकि इस आचरण से उन्होंने महात्मा गांधी के नाम से स्थापित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की छवि और गरिमा को क्षति पहुंचायी है। जनवादी लेखक संघ भारतीय ज्ञानपीठ के न्यास से भी मांग करता है कि वह भी ‘नया ज्ञानोदय’ के ऐसे गैरजिम्मेदार संपादक के खिलाफ कार्रवाई करे और विभूतिनारायणराय को ज्ञानपीठ पुरस्कार के निर्णायक मंडल से अलग करे।

जनवादी लेखक संघ यह भी मांग करता है कि लेखक और लोकतांत्रिक समाज से विभूतिनारायण राय और नया ज्ञानादय के संपादक इस निंदनीय आचरण के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।


Press Release

New Delhi

24 January 2010

Janwadi Lekhak Sangh has sent today the following communication to the Prime Minister of India

Janwadi Lekhak Sangh, an all-India association of Hindi and Urdu writers condemns the collaboration of Sahitya Akademi with Samsung, a multinational company that is funding an award in the name of Rabindra Nath Tagore whose song, Jan gan man… is our national anthem and that symolises our national independence, integrity and sovereignty. The awards are to be given to Indian writers with that funding tomorrow on the eve of our Republic Day. Most of the Indian writers who cherish the ideal of anti-imperialism and self-reliance have expressed their condemnation on this move by Sahitya Akademi under the Minstry of Culture that is headed by Prime Minister of India himself. Uptil now Sahitya Akademi had been getting funds from Central Government and the funding had been adequate to meet the expenses on its awards. Now it will be a blot on our cultural ethos and Indian independence if we allow this collaboration with an MNC such as Samsung or Ford Foundation or any other like them. It is a kind of cultural imperialism that will never be tolerated by conscientious writers of India. We, therefore, appeal to Dr. Manmohan Singh, the Prime Minister of India to intervene and get the collaboration cancelled immediately. Samsung is free to establish its own award with its own money instead of using our national academy of letters and it will be shameful if the Prime Minister allows this move by an icon of imperialism to weild control over it by its money power.

--M.M.P. Singh, Gen. Secretary ; Chanchal Chauhan, Gen.Secretary


प्रेस विज्ञप्ति

नई दिल्‍ली

24 जनवरी 2010

जनवादी लेखक संघ ने आज प्रधानमंत्री के नाम निम्नलिखित अपील भेजी है:

जनवादी लेखक संघ जो कि हिंदी-उर्दू लेखकों का अखिल भारतीय संगठन है सैमसुंग के साथ साहित्य अकादमी के उस गठबंधन की पुरजोर भर्त्सना करता है जिसके तहत इस विदेशी कंपनी के पैसे से रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर जिनका जन मन गण---गीत हमारा राष्ट्रगान है, भारतीय लेखकों को कल गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर पुरस्कार दिये जाने हैं। यह गीत हमारी आजादी, एकता और संप्रभुता का प्रतीक है । साहित्य अकादमी के इस कदम की ज्यादातर लेखकों ने निंदा की है जो अपनी विचारधारा से साम्राज्यवाद के विरोधी हैं और देश की आत्मनिर्भरता में यकीन रखते हैं। साहित्य अकादमी संस्क्रति मंत्रालय के अधीन है जो कि प्रधानमंत्री खुद संभाल रहे हैं । अब तक साहित्य अकादमी को केंद्र सरकार से इतनी राशि मिल जाती थी जिससे पुरस्कारों समेत उसका काम चल जाता था, इसलिए उसे इस तरह के विदेशी गठबंधन की कोई ज़रूरत नहीं थी । विदेशी कंपनी की यह दखलंदाजी सांस्क्रतिक साम्राज्यवाद का एक उदाहरण है जिसे भारत के लेखक कभी स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए हम प्रधानमंत्री महोदय से अपील करते हैं कि वे तुरंत साहित्य अकादमी के इस कदम पर रोक लगायें और सैमसुंग समझौते को रद्द करवायें। सैमसुंग अपने पैसे से पुरस्कारों की स्थापना करने को स्वतंत्र है, हमारी राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था को इस्तेमाल करने की इजाजत उसे नहीं दी जानी चाहिए । यदि प्रधान मंत्री महोदय ऐसा होने देते हैं जिससे सैमसुंग जैसी विदेशी कंपनी साहित्य अकादमी पर हावी हो जाये जो कि साम्राज्यवादी धनबल का एक प्रतीक है तो यह एक शर्मनाक स्थिति होगी ।

--मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह (महासचिव) व चंचल चौहान (महासचिव)


प्रेस विज्ञप्ति

नयी दिल्‍ली 17 जनवरी : जनवादी लेखक संघ प्रसिद्ध मार्क्‍सवादी चिंतक और नेता कामरेड ज्‍योति बसु के निधन पर गहरा शोक व्‍यक्‍त करता है । वे काफी अरसे से बीमार चल रहे थे ।

कामरेड ज्‍योति बसु भारत के जनवादी आंदोलन के अग्रणी और जाने माने राजनीतिज्ञ तो थे ही, भारत के शोषित और वंचित जनगण के हितों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध व्‍यक्तित्‍व थे । उन्‍होंने अपना पूरा जीवन सर्वहारा राजनीति के लिए स‍मर्पित किया और उसके राजनीतिक विचारों और अमल के लिए प्राणपण से लगे रहे ।

जनवादी लेखक संघ के 1997 में हुए कोलकाता सम्‍मेलन के वे स्‍वागताध्‍यक्ष थे और संगठन के अनुरोध पर उन्‍होंने प0 बंगाल में हिदी अकादमी की स्‍थापना की थी । वे बांग्‍लाभाषी अवाम में तो सर्वाधिक लोकप्रिय नेता तो थे ही, हिंदी-उर्दू क्षे्त्रों में भी उन्‍हें उतना ही सम्‍मान और स्‍नेह हासिल था ।

जनवादी लेखक संघ उन्‍हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उनके परिवारजनों व तमाम साथियों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता है


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