
फैलती हुई असुरक्षा की भावना, शासनतंत्र की नपुंसकता और नृशंसता और नौकरशाही का उस पर गहरा होता हुआ प्रभाव, पुलिस द्वारा स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार और अभियुक्तों की आंखें निकाल लेने की घटनाएं, देश के विभिन्न भागों में सयि विघटनकारी प्रवृधयों को उकसाने और बढ़ाने वाली शक्तियों द्वारा राष्टीय एकता को विखंडित करने तथा जनवादी आंदोलन को कमज़ोर करने की साजिशें; क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय और जाति के नाम पर फैलायी जा रही संकीर्णता, वैमनस्य, तनाव और दंगे, निम्न मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों और पढ़े लिखे युवकों के असंतोष को पथभ्रष्ट करने, उनमें कुत्सित मानसिकता भरने, उन्हें आत्मकेंद्रित और समाजविमुख बनाने के लिए बाज़ारों को रक्तपात, अपराध, सैक्स आदि से संबंधत और साम्राज्यवादी देशों, विशेषत: अमरीका से आयातित साहित्य से पाट देने की खुली छूट और तरह तरह के आध्यात्मिक गुरुओं और उनके संगठनों का फैलाव, चलचित्र और कला के अन्य मायमों तथा प्रचार प्रसार के साधनों से युवकों और जनसाधारण को काल्पनिक लोकों में भटकाने या उन्हें अवांछित दिशाओं में प्रवृध करने की साजिश - वर्तमान भारतीय जीवन की एक तस्वीर यह है, और यह तस्वीर बहुत ही निराशाजनक है।
लेकिन, एक दूसरी तस्वीर भी है जो हमारी जनता के स्वस्थ मन की, अन्याय और अत्याचार के प्रति उसकी सहज घृणा और उसके विरुद्ध संघर्ष के अथक और अदम्य उत्साह की तथा अपनी अंतिम विजय में उसके विश्वास की तस्वीर है। अपनी मुक्ति और देश के भविष्य की यह तस्वीर उत्तरोत्तर उद्धबुद्ध, एकताबद्ध और संगठित होती हुई जनता बना रही है। भारतेंदु और हाली से लेकर आज तक हमारे सारे देशभक्त और जनवादी लेखकों ने उसी तस्वीर को पूर्णता देने के लिए अपनी क़लम की सारी ताक़त जनता को समर्पित की है। उन्होंने प्रकाशन और प्रचार प्रसार के मायमों पर शासक वर्गों के आधपत्य के बावजूद, जनता पर उनकी विचाराधरा के असर के बावजूद अपने सीमित साधनों के बल पर सारे प्रतिगामी और पतनशील मूल्यों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए जनाभिमुखता, धर्मनिरपेक्षता, आशावादिता, संघर्षशीलता, शोषित-पीड़ित वर्गों के प्रति आत्मीयता, अंतर्राष्टीयता आदि मूल्यों को हमारे साहित्य की विरासत का अभिन्न अंग बना दिया है। उन्होंने अपने को संगठित कर, अपनी लघु और अक्सर अनियतकालीन पत्रिकाएं निकालकर, गोष्ठियों एवं विचार-विनिमय आदि के आयोजन कर जनता और साहित्य के संबंधों को मज़बूत करने, साहित्य को जनता की आकांक्षाओं का आइना बनाने और जनता की चेतना के स्तर को ऊपर उठाने में जो सफलताएं हासिल की हैं, वे सारे जनवादी लेखकों के लिए चुनौती और संबल दोनों हैं।
वर्तमान व्यवस्था और हमारी जनता के बीच निरंतर और स्पष्ट तथा और उग्र होता जा रहा अंतर्विरोध आज की स्थिति की मुख्य विशेषता है। अपने तमाम विचाराधरात्मक अस्त्रों से जनता को गुमराह करने या दमन के अपने तमाम अस्त्रों से संघर्ष के उस मनोबल को तोड़ने में अपनी अक्षमता के अहसास के साथ व्यवस्था इस अंतर्विरोध का हल जनता के लिए जनतांत्रिक अधकारों और नागरिक स्वतंत्रता पर आक्रमण के द्वारा करना चाहती है। आपात्काल की घोषणा एक ऐसा ही आक्रमण था। आज पुन: वैसे ही, उससे भी अधिक और सुनियोजित और ज़ोरदार, आक्रमण की तैयारियों के लक्षण सामने आ रहे हैं और सर्वाधकारवाद को आपात्काल से भी दृढ़ आधार पर स्थापित करने के लिए न सिर्फ़ राष्टीय सुरक्षा क़ानून तथा आवश्यक सेवा अनुरक्षण क़ानून की तरह के काले क़ानूनों का सहारा लिया जा रहा है बल्कि देश के संवाधिन को प्राय: उलट देने की साजिशें चल रही हैं और उसके अंतर्गत जनता के मौलिक अधकारों, समाचार पत्रों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता, राज्यों के सीमित स्वाया अधकारों आदि पर हमले किये जा रहे हैं। इस तरह जनवाद पर ख़तरे के बादल फिर मंडराने लगे हैं।
इसलिए जनवाद की रक्षा और उसके विकास का संघर्ष जनता के विभिन्न वर्गों और हिस्सों के सारे संघर्षों का केंद्रीय और अभिन्न अंग बनता जा रहा है। नागरिक के रूप में अपनी सामाजिक भूमिका के निर्वाह के लिए लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न को उस संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता; क्योंकि यह असंभव है कि जनता के जनवादी अधकार और उसकी नागरिक स्वतंत्रता उससे छिन जाये, उसका दमन हो और लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क़ायम रह जाये और वह दमन से बच जाये।
कला और साहित्य की शक्ति का बोध व्यवस्था को भी है। इसलिए जनवादी मूल्यों में आस्था रखने वाले और उसके लिए संघर्ष करने वाले लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के दमन की योजना बनाने वाला शासकवर्ग बड़े पैमाने पर लेखकों को खरीदने के प्रयत्न में लगा है। उसके सयि प्रोत्साहन से व्यवस्था से जुड़े हुए तथा प्रतिक्रियावादी लेखक बड़े ही सुनियोजित ढंग से अपने को पुनर्संगठित कर रहे हैं और आधुनिकतावाद तथा तरह तरह के यथार्थविरोधी साहित्यिक नारों को उछालने के साथ साथ जनाकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने वाले तथा उसके लिए संघर्ष करने वाले लेखकों को भी तरह तरह के संरक्षणों, प्रलोभनों तथा पुरस्कारों से गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। निश्चय ही, प्रयोगवादी, और अन्य यथार्थविरोधी रुझानों के बढ़ते हुए दबावों के बावजूद हमारे साहित्य में यथार्थवादी परंपरा को सुरक्षित रखने और विकसित करने के असंगठित प्रयास चलते रहे। हमारी जनता और लेखों में व्यवस्था द्वारा फैलाये गये भ्रमों के टूटने के साथ उन्हें और भी बल मिला। बाद में, लघु पत्रिकाओं की प्रखर चेतना से संपन्न लेखकों ने संघर्षमूलक रचनात्मक वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस वातावरण को विघटित करने में शासन और व्यवस्था की मिलीभगत है। परिणामत:, आधुनिकतावादी और सौंदर्यवाद की प्रवृधयों के पुनर्विस्तार के ख़तरे आज फिर हमारे सामने उपस्थित हैं।
इस स्थिति की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि व्यवस्था ने साहित्य का व्यवसायीकरण कर साहित्य के सारे सृजनात्मक मूल्यों और उसके महान सामाजिक के लिए ख़तरा पैदा कर दिया है। व्यवस्था ने साहित्यिक कृतियों के प्रकाशन को भी लगभग असंभव सा कर दिया है। पिछले तीन-चार वर्ष में प्रकाशन साधनों की क़ीमतों में लगभग दस गुनी वृद्धि का यह एक स्वाभाविक परिणाम हुआ है कि साहित्यिक कृतियां आज सामान्य पाठकों की यशक्ति के बाहर हो गयी हैं।