भीमा-कोरेगांव केस में गिरफ्तारी

नयी दिल्ली  7 जून  इस साल पहली जनवरी को पुणे के नज़दीक भीमा-कोरेगांव संग्राम की दो सौवीं जयन्ती के मौक़े पर हुई जातिवादी-दलितविरोधी हिंसा के आरोप में पुणे पुलिस द्वारा संस्कृतिकर्मियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. 6 जून की सुबह पुलिस ने इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लॉयर्स से जुड़े नागपुर के वकील सुरेन्द्र गाडगिल, संस्कृतिकर्मी और दलित कार्यकर्ता सुधीर धवले, दिल्ली स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन, नागपुर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर शोमा सेन और विस्थापन-विरोधी कार्यकर्ता महेश राउत को ग़ैर-कानूनी गतिविधि निवारक क़ानून (यूएपीए) के तहत गिरफ़्तार किया. इन्हें ‘टॉप अर्बन माओइस्ट ऑपरेटिव्स’ बताना और पहली जनवरी को हुई हिंसा का ठीकरा इनके सर फोड़ना निस्संदेह पुणे पुलिस की गढ़ी हुए बेहद कमज़ोर कहानी है, पर यह भी निश्चित है कि इसका सहारा लेकर प्रतिरोध की आवाज़ उठानेवाले कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों को उत्पीड़ित करने में राज्य कोई कसर नहीं छोड़ेगा. भीमा-कोरेगांव हिंसा के असली कसूरवार खुलेआम घूम रहे हैं. हिन्दुत्ववादी मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े समेत लगभग 50 आरंभिक आरोपी जमानत पर या साक्ष्यों के अभाव में बाहर हैं. और उसी हिंसा के नाम पर सरकार वाजिब और असुविधाजनक सवाल उठानेवाली आवाज़ों को ख़ामोश करने की साज़िश में लगी है.

जनवादी लेखक संघ यूएपीए के तहत इन जागरूक नागरिकों की गिरफ़्तारी की निंदा करता है और महाराष्ट्र सरकार से इनकी तत्काल रिहाई की मांग करता है.