श्री अजित कुमार के निधन पर

नयी दिल्ली: 18 जुलाई :“ ‘चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे / क्यों दिखें? / हम लिखेंगे: / चांदनी उस रुपये-सी है / कि जिसमें / चमक है, पर खनक ग़ायब है।”

नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे। आज सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया। देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था। तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं। इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं। अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है।

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे। कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था।

श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है। जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।