प्रो. बी पी महेश चन्द्र गुरु की गिरफ़्तारी और डॉ. अली इमाम खान के ख़िलाफ़ एबीवीपी का हंगामा व कुत्सित प्रचार

 

नयी दिल्ली : जून 23 : मैसूर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफ़ेसर बी पी महेश चन्द्र गुरु की गिरफ़्तारी और निलंबन तथा झारखण्ड के गिरिडीह कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अली इमाम खान के ख़िलाफ़ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का हंगामा और कुत्सित प्रचार अभियान, शिक्षाविदों पर हिन्दुत्ववादियों के हमलों की सबसे ताज़ा कड़ियाँ हैं. हम इन दोनों घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. चिंताजनक पहलू यह है कि सिर्फ़ भाजपा शासित राज्यों में नहीं, कांग्रेस सरकार वाले राज्यों में भी हिन्दुत्ववादी ताक़तों को अपने कुत्सित अभियानों में लगातार सफलता मिल रही है और वहाँ भी शासन-प्रशासन के स्तर पर उनके ख़िलाफ़ सख्ती बरतने की इच्छा शक्ति का स्पष्ट अभाव देखा जा रहा है.

प्रो. बी पी महेशचन्द्र गुरु के ख़िलाफ़ कोई डेढ़ साल पहले अपने भाषण में राम को लेकर तथाकथित नकारात्मक/अपमानजनक टिप्पणी करने और हिन्दुओं की भावनाएं आहत करने की शिकायत दर्ज की गयी थी. इस 17 जून को उन्हें अदालत ने पुलिस हिरासत में भेज दिया और 20 तारीख़ को जब जमानत की अर्जी पर सुनवाई हुई, तब तक दो और मामलों में उन पर शिकायत आने के कारण उन्हें जमानत नहीं दी गयी. पुलिस हिरासत में होने की बिना पर मैसूर विश्वविद्यालय ने 20 तारीख़ को ही अपनी सिंडिकेट की बैठक कर उन्हें निलंबित कर दिया है.

झारखण्ड में इसी महीने की 17 तारीख़ को गिरिडीह कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अली इमाम खान के ख़िलाफ़ वहाँ के ए.बी.वी.पी. के छात्रों ने कुलपति की उपस्थिति में खूब हंगामा किया और एक निश्चित विचारधारा के अनुसार कॉलेज चलाने का आरोप लगा कर नारेबाज़ी की. ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ बोलने की मनमानी कसौटी सामने रख कर उन पर देशद्रोही होने का आरोप लगाया गया और सन्दर्भ से काटकर उनकी बातों को सोशल मीडिया पर फैलाते हुए उनके ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल बनाने की कोशिश की गयी.

विश्वविद्यालय आलोचनात्मक चेतना विकसित करने के केंद्र होते हैं. भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इन केन्द्रों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं और यह सुनिश्चित करने की कोशिश हो रही है कि दहशत का माहौल पैदा कर वैचारिक दायरों को अनुर्वर/बाँझ बना दिया जाए. श्री दाभोलकर, कामरेड पानसारे और प्रो. कलबुर्गी के हत्यारे, जिनकी पहचान वैसे भी अज्ञात नहीं थी और सीबीआई की जांच से तो अब पूरी तरह स्थापित हो चली है (भले ही इसमें गहरा संदेह हो कि जांच अबाधित रूप से जारी रह पायेगी), हर स्तर पर सक्रिय हैं. वे अगर अंधश्रद्धा-निर्मूलन में लगे कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को जड़ से साफ़ कर देने पर आमादा है तो साथ ही ऐसे हर विचार का गला घोंट देने की कोशिशों में भी लगे हैं जिनसे ऐसे कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के निर्माण का सम्बन्ध है. पुणे के फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्वविद्यालय आदि इसके सबसे जाने-पहचाने उदाहरण हैं, लेकिन ऐसे और सैकड़ों उदाहरण हैं जहां बुद्धिजीवियों को लेकर क्रूरता-असहिष्णुता-गुंडागर्दी की घटना संचार माध्यमों में उतनी चर्चा भले न पा सकी हो, अपने मिज़ाज में उनसे अभिन्न है. प्रो. बी पी महेशचन्द्र गुरु और डॉ. अली इमाम खान से जुड़ी घटनाएं इसकी ताज़ा मिसाल हैं.

हम इन घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों तथा विद्यार्थियों से उम्मीद करते हैं कि साम्प्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ जिस तरह की एकजुटता हाल के, ख़ासतौर से प्रो. कलबुर्गी की हत्या के बाद के महीनों में दिखाई पड़ी है, उसे और मजबूती देते हुए वे प्रतिरोध की कार्रवाइयों को आगे बढ़ाएंगे. प्रो. बी पी महेशचंद्र गुरु की गिरफ़्तारी और निलंबन के ख़िलाफ़ सबको मिलकर आगे आना चाहिए. साथ ही, हम हर बार इन ताक़तों की शर्मनाक हरकतों के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ही इकट्ठे हों, यह ज़रूरी नहीं और न ही उचित है. ‘आज़ाद वतन आज़ाद जुबां’, ‘प्रतिरोध’, ‘विवेक के हक में’, ‘साझा संघर्ष साझी विरासत’ –इन नामों से साथ जो संयुक्त कार्यक्रम पिछले दिनों होते रहे हैं, उन्हें जारी रखने और नए तौर-तरीकों पर विचार करने की ज़रूरत है